हिमाचल में पर्यटन विकास नीतियां: एक विश्लेषण

By | October 12, 2019
Topic: SYLLABUS for HPAS MAINS: Tourism policy, potential, and initiative in Himachal Pradesh.(GS-3, UNIT-3)

हाल ही में हिमाचल प्रदेश सरकार द्वारा नई पर्यटन नीति 2019 को मंजूरी दी गई। इसमे पर्यटन विकास के कुछ नए पहलुओं को भी शामिल किया गया है जो पहले की नीतियों में प्रत्यक्ष तौर पर शामिल नहीं थे। जैसे झील पर्यटन, फिल्म पर्यटन, धार्मिक पर्यटन, एग्रो-ऑर्गेनिक पर्यटन और बर्फ पर्यटन आदि।राज्य में सभी तरह के प्राकृतिक, साहसिक, वन्यजीव और स्वास्थ्य पर आधारित पर्यटन की भी अपार संभावनाएं हैं, इन पहलुओं को भी इसमें शामिल किया गया है जो सरकार द्वारा बनाई गई पहले की पर्यटन नीतियों में भी शामिल थे।

राज्य के कुल सकल राज्य घरेलू उत्पाद में पर्यटन का 6.6% योगदान है और यह राज्य में एक बड़ा रोजगार प्रदाता भी है। हालिया पर्यटन नीति के इलावा वर्ष 2005 में प्रदेश ने नई पर्यटन नीति तैयार की थी जिसके लक्ष्यों में राज्य को अग्रणी पर्यटक गंतव्य बनाने के साथ-साथ इसे आर्थिक-संवृद्धि के प्रमुख इंजन के तौर पर विकसित करना; राज्य में सतत पर्यटन को बढ़ावा देकर पर्यावरण सुरक्षा को केंद्र में रखना; निजी क्षेत्र की सहभागिता सुनिश्चित करके इस क्षेत्र में निवेश प्राप्त करने पर जोर देना; राज्य में विरासत क्षेत्रों को चिन्हित कर विरासत पर्यटन को बढ़ावा देना आदि शामिल था।

वर्ष 2013 में भी नई सतत पर्यटन नीति को मंजूरी दी गई थी जिसमे राज्य में पर्यटन विकास के सभी आर्थिक, सामाजिक, सांस्कृतिक और पर्यावरणीय आयामों को ध्यान मे रखा गया था। नीति में पर्यटन को अंतरराष्ट्रीय ब्रांड के तौर पर स्थापित करने की बात की गई थी। इसके साथ-साथ सामाजिक आयामों को भी इसमें शामिल किया गया था जैसे सामुदायिक भागीदारी पर जोर दिया गया था। सांस्कृतिक आयामों को भी शामिल किया गया था इसके अंतर्गत होम स्टे योजना शुरू की गई थी ताकी पर्यटक यहां की स्थानीय संस्कृति को समझे व इसका आनंद उठा सकें और दूरदराज के ग्रामीण क्षेत्रों तक पर्यटन का विकास हो सके।पर्यटकों की विशेष सुविधाओं के लिए राज्य में टैक्सी चालकों को भी प्रशिक्षण दिए जाने की बात इसमें की गई थी। इसके अंतर्गत पर्यटन को राज्य में एक योजनाबद्ध तरीके से विकसित करने पर जोर दिया गया था।

वर्ष 2017 में पुरानी पर्यटन नीति में कुछ बदलाव करके नई इको-टूरिज्म पॉलिसी को मंजूरी दी गई थी जिसमे पर्यावरणीय, समाजिक, आर्थिक व धारणीय विकास की जरूरतों के सभी पहलुओं को शामिल किया गया था। इसमें पर्यटन को इस तरह से विकसित करने पर बल दिया गया था ताकि पर्यावरण पर आधारित विशेष वन क्षेत्रों को चिन्हित कर स्थानीय लोगों को रोजगार व उनकी संस्कृति को बढ़ावा दिया जा सके व साथ-साथ उन्हें पर्यावरण संरक्षण के लिए भी प्रोत्साहित किया जा सके।लेकिन यह सोचने का विषय है कि पिछले पाँच सालों में पर्यटन नीतियों में इतने बदलावों के बावजूद भी राज्य में पर्यटकों के आगमन में अधिक वृद्धि नहीं हुई है और ना ही राज्य के सकल राज्य घरेलू उत्पाद में पर्यटन क्षेत्र का योगदान बड़ा है बल्कि हिमाचल में पर्यटन की अनियंत्रित व अनियोजित वृद्धि से यहां के पारिस्थितिक तंत्र और जैव-विविधता पर नकारात्मक प्रभाव पड़ा है।

कुछ ही क्षेत्रों में पर्यटन के संकेंद्रण से ट्रैफिक जाम, अनियंत्रित निर्माण कार्य, अपशिष्ट निपटान की समस्या और प्रदूषण की समस्या बढी है। क्या कारण है कि हम नीतियां तो बना रहे हैं लेकिन उसका वास्तविक या धरातल पर हमें फायदा नहीं देखने को मिल रहा है। कारण बहुत से हो सकते हैं लेकिन कुछ प्रमुख कारणों में शामिल है, नीतियों का सही से कार्यान्वयन ना हो पाना, उचित निवेश की कमी, विभागों की आपसी कमजोरी, अवसरचनात्मक विकास की कमी, राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर ऐड्वर्टाइज़्मन्ट की कमी आदि।हालांकि नीतियों में लगभग सभी पहलुओं को शामिल किया गया है जिससे राज्य में पर्यटन विकास को गति मिलेगी लेकिन फिर भी कुछ जरूरी पहलू जिन पर ध्यान नहीं दिया गया है, जैसे, इनमें पर्यावरण संरक्षण को बढ़ावा देने की बात की गई है लेकिन पिछले कुछ सालों में यह पाया गया है कि पर्यटन गतिविधियों से ही राज्य में पर्यावरण संबंधी चिंताएं बढ़ी है। इनमें निजी क्षेत्र के निवेश की बात की गई है लेकिन इस दिशा में भी अभी तक सरकार के सार्थक प्रयास देखने को नहीं मिले हैं। एक तरफ सरकार जहां इन नीतियों के माध्यम से सांस्कृतिक पर्यटन को बढ़ाना चाहती है। वहीं दूसरी तरफ पर्यटकों के मार्गदर्शन के लिए स्थानीय लोगों के प्रशिक्षण व जागरूकता के पहलुओं को नीति में शामिल नहीं किया गया है। पर्यटकों के आगमन से राज्य में ट्रैफिक जाम की समस्या, मादक द्रव्यों के प्रचलन में वृद्धि व कीमतों में भी अनियंत्रित वृद्धि हुई है। इस संबंध में भी नीतियों में कोई उल्लेख नहीं किया गया है।

राज्य में पर्यटन की अपार संभावनाओं को देखते हुए यह जरूरी है कि सभी विभागों को पर्यटन से जोड़ा जाए इससे जंहा ढांचागत सुविधाओं के विकास मे तेजी आयेगी वहीं पर्यटन क्षेत्रों के उचित प्रबंधन में भी यह सहायक होगा।

लेखक:
लाभ सिंह
निरीक्षक सहकारी सभाएं, कुल्लू।

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